Monday, 17 November 2014

1279_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

~~~~~~ .....नहीं तो सिर धुन-धुनकर पछताना पड़ेगा  ~~~~~~~

संसार के जिन-जिन पदार्थों, वस्तुओं आदि को हम अपना मान रहे हैं, वे हमारे नहीं हैं, उनसे हमारा वियोग अवश्यंभावी है। अतएव उनके संग्रह, संरक्षण में ईश्वर को भुला देना उचित नहीं। परमात्मा की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त सभी कर्म व्यर्थ अथवा अनर्थ हैं।

-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Sunday, 16 November 2014

1278_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU



~~~~~निन्दा-स्तुति की उपेक्षा करें~~~~~~

निन्दा और अपमान की परवाह न करें। निर्भय रहें। प्रसन्न रहें। अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहें। जो डरता है उसी को दुनिया डराती हैं। यदि आपमें डर नहीं है, आप निर्भय हैं तो काल भी आपका बाल बाँका नहीं कर सकता। जो आत्मदेव में श्रद्धा रखकर निर्भयता से व्यवहार करता है वह सफलतापूर्वक आगे बढ़ता जाता है। उसे कोई रोक नहीं सकता। वह अपनी मंजिल तय करके ही रहता है।

-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Saturday, 15 November 2014

1277_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU



~~~~ उत्साह जहाँ, सफलता वहाँ ~~~~

जो कार्य करें उत्साह से करें, तत्परता से करें, लापरवाही न बरतें। उत्साह से काम करने से योग्यता बढ़ती है, आनंद आता है। उत्साहहीन होकर काम करने से कार्य बोझा बन जाता है।

उत्साहसमन्वितः.... कर्ता सात्त्विक उच्यते।

ʹउत्साह से युक्त कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।ʹ (श्रीमद् भगवदगीताः 18.26)

-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Friday, 14 November 2014

1276_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः |

विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ||




जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं | दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नीगमन करनेवाले के समान पापी है |

- भगवान शिव जी  (स्कन्द पुराण अंतर्गत शिव पार्वती संवाद )

Thursday, 13 November 2014

1275_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU




हरि गुरु साध समान चित्त, नित आगम तत मूल।
इन बिच अंतर जिन परौ, करवत सहन कबूल ॥


समस्त शास्त्रों का सदैव यही मूल उपदेश है कि भगवान, गुरु और संत इन तीनों का चित्त एक समान (ब्रह्मनिष्ठ) होता है। उनके बीच कभी अंतर न समझें, ऐसी दृढ़ अद्वैत दृष्टि रखें फिर चाहे आरे से इस शरीर कट जाने का दंड भी क्यों न सहन करना पडे़ ।
-संत रैदास जी

Tuesday, 11 November 2014

1274_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

~~~~~~~  गुरूभक्तियोग की महत्ता  ~~~~~~~

आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।
ताः सर्वाः सफला देवि गुरूसंतोषमात्रतः।।


'हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ... ये सब गुरूदेव के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं।'
(भगवान शंकर)

Sunday, 9 November 2014

1273_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU




~~~~~~   हो गई रहेमत तेरी......  ~~~~~~~

हे प्यारे सदगुरू परमात्मा ! मुझे अपनी आत्म-मस्ती में थाम लो। मैं संसारियों के अज्ञान में कहीं बदल न जाऊँ। मोह-ममता में कहीं फिसल न जाऊँ।


जेसीं जिय  जान रहे जेसीं तन में प्राण रहे।

प्रीत संधी डोरी तो पासे सरधी रहे।।

डप आहे मुखे इहो वञ्जों मतां तो खां मां विछड़ी।

अञां प्रीत संधी डोरी सजण आहे कचड़ी।।

जोरसां जलजा अञां नंढडो ही बालक।।

तब तक जी में जान है, तन में प्राण है तब तक मेरी साधना की डोरी, मेरी प्रीति की डोरी तेरी तरफ सरकती रहे... सरकती रहे....।

इस बात का तू ख्याल रखना।

Thursday, 6 November 2014

1272_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

   ~~~~~ क्षण का भी प्रमाद मृत्यु है  ~~~~~~

प्रिय आत्मन् ! न तेरा पहले जन्म था न वर्त्तमान में है और न आगे होगा। यदि क्षणमात्र के लिए अपने आसन से हटेगा, अपने आपको स्वरूप में स्थित न मानेगा, प्रमाद करेगा तो वही प्रमाद विस्तीर्ण जगत हो भासेगा।

-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Wednesday, 5 November 2014

1271_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU



विदाई की वेला में

ऐसा व्यक्ति नहीं, जो मरेगा नहीं। ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिसका वियोग न होगा। ऐसा कोई देश-देशांतर, लोक-लोकांतर नहीं है जो प्रलय से बच पायेगा। अतः अनित्य की आसक्ति छोड़कर नित्यमुक्त आत्मस्वरूप में स्थिर होने के लिए जो सावधान रहता है उसी का जीवन सफल होता है, उसी का जन्म धन्य है !
-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Monday, 27 October 2014

1270_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

सभी शास्त्रों का सार...

शरीर न सत् है, न सुन्दर है और न प्रेमरूप है। यह तो हड्डी-मांस, रूधिर और वात-पित्त-कफ से बना हुआ एक जड़ ढाँचा है। यह शरीर पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं (मृत्यु) की तरफ जा रहा है। परंतु आप तो पहले भी थे, अभी भी हो और बाद में भी रहोगे। अपने को सदैव सच्चिदानंदस्वरूप मानो।

-Pujya Sant Shri Asharam Ji Bapu

Video Gallery ( MuSt WaTcH )

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